सोमवार, 15 अगस्त 2011

IS THIS FREEDOM FOR A COMMON MAN

लो भाई फिर पंद्रह अगस्त आ गया. आप सोच रहे होंगे कि स्वतंत्रता दिवस ही लिखा देते तो क्या चला जाता कोई इस के लिए फाइन तो नहीं लग जाता. सही है भाई इतनी तो स्वतंत्रता अवश्य मिली हुई है हमें अरे हमें तो इतनी ही मिली है पर कुछ लोगों को तो कुछ अधिक ही मिली हुई है. आप सोच रहे होंगे भला कौन हो सकता है. अरे भाई अपने वो राज भैया से ही पूछ लो संविधान की आत्मा को तार तार करते हुए वो भाषा और क्षेत्र के नाम पर किसी के बारे में कुछ भी बोल दें सार्वजनिक रूप से ही क्यूँ न हो वो स्वतंत्र हैं आप में है हिम्मत क्या आप सच के लिए ही कुछ बोल दें राष्ट्रहित में भ्रष्टाचार के विरुद्ध ही बोल दें बेचारे बाबा रामदेव की तो बोलती बंद हो गयी हम आप कौन हैं. जबतक हम आम लोगों को रोगमुक्त करने के लिए सर के बल खड़े कर रहे थे सब खुश थे जैसे ही राष्ट्र को भ्रष्टमुक्त बनाने के लिए सरकार को शीर्षासन कराया  देख लीजिये हाल. पता नहीं उनके भी अभी कहाँ हैं. अब तो मीडिया भी भूल चूका है. जैसे ए. रजा और सुरेश कालमाडी जैसे लोगों को धन चाहिए चाहे वो जैसा हो या जहाँ से हो मीडियाको भी मसाला चाहिए चाहे  वो शीला की जवानी से ही क्यूँ न हो. हम आप कौन हैं हमारे आपके लिए चीजें अनिवार्य होती हैं बाबू साहब लोगों के लिए इच्छा पर निर्भर करता है. हमें डाक्टर बनना है तो परीक्षा पास करो किसी साहब का बेटा है डोनेशन है न. नेताजी के साले ने मर्डर भी कर दिया  तो वाह वाह हम और आप उसे देख भी लें तो मुसीबत. किसी गरीब का बच्चा भूखे या इलाज के बिना मर जाए तो पड़ोसी भी न सुने पर किसी साहेब के बच्चे ने जरा ठुमका क्या लगा दिया सारा मीडिया कैमरा लेकर दौड़ पड़ेगा. हमारी आपकी क्या हिमाकत हम आप मच्छर और कीड़े मकौड़े ही मार सकते हैं हिम्मत तो कसाब  साहब की है वो हमें और आपको कीड़े की  तरह मार सकते हैं और किस्मत भी देखिये क्या खातिरदारी हो रही है हमें और आपको ससुराल में भी नसीब न हो. जरा सोचिये क्या इस देश में एक कमजोर आदमी अपने स्वाभिमान के साथ जी सकता है. किसानो की जमीन खुद सरकार कौड़ियों के भाव जबरदस्ती  खरीद कर पूंजीपतियों को दे देती है गरीब आदमी अपनी सम्पत्ती नहीं बचा सकता और मंदी के समय पूंजीपतियों को रहत के नाम पर धन दिया जाता है. न हम भय से मुक्त हैं न भ्रष्टाचार से न स्वाभिमान सुरक्षित है न भविष्य क्या हम वास्तव में स्वतंत्र हैं. चलिए यहाँ तो व्यवस्था दोषी है इस देश में एक ही बड़ा काम है हमारे लिए वो है वोट देना. उस समय हम धर्म और जाति की बेड़ियों में जकड़े रहते हैं वहां कौन दोषी है. सच तो ये है की अगर सिर्फ वोट देते समय हम इस जाति और धर्म की बेड़ियाँ खोल दें तो सबकुछ तो नहीं पर बहुत कुछ सही हो जाए.

कोई टिप्पणी नहीं: